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August 19, 2011

तन्हाई और परछाई

by Dev B

लिए ढेर सारी तन्हाई
सुबह ने बनायीं कई परछाई
उनमे एक थी “मेरी परछाई”
चला था लिए मैं तन्हाई,
राह न जाने “मेरी परछाई”|

साथ चली थी कई परछाई
कभी वो अपनी थी तन्हाई
कभी वो परायी थी परछाई,
कभी वो काली थी परछाई
कभी वो धुंधली थी तन्हाई

बनती बिगडती परछाई
हल चल करती तन्हाई
पल पल बदलती परछाई
क्षण क्षण छलती परछाई
मन मन बहलाती तन्हाई

बढती घटती थी परछाई
तन ढंग थी सारी परछाई
मन संग थी एक तन्हाई
जो अब दूर करे तन्हाई
मन ढूंढती थी “वो परछाई”

जानी पहचानी सी परछाई
मिल गई एक “वो परछाई”
कुछ खास थी अब तन्हाई
घटती मन की अब तन्हाई
लगी मुझ-सी “वो परछाई”

पल पल ख़तम होती तन्हाई
हर पहर बढती “वो परछाई”
क्या मेरी थी “वो परछाई”
या मैं था उसकी “वो परछाई”
एक दूजे के हम “वो परछाई”

साँझ होते धुंधलाई “वो परछाई”
फिर घबराई “मेरी परछाई”
उस रात जानी “मेरी परछाई”
मेरी या तेरी हो “वो परछाई”
अँधेरे में न साथ देती “कोई परछाई”

– Dev B

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