Posts tagged ‘my poem’

February 26, 2009

एक नए दिन की शुरुआत, हँसी के साथ

by Dev B

समंदर के किनारे, रेत की महल बनाते वक्त,
मुझे पता था लहर आयेगी ,और बहा ले जायेगी रेत
और कुछ भी नही बचेगा, कोई नमो निशान भी नही |

फिर भी डर नही था,इक जुनू था इसे पुरा करने का ,
सो शुरुआत की, पर शायद लहर का डर था सो रेत का पहाड़ बनाया |
और उसकी चोटी पर कुछ रेत के ढेर को आकार देने लगा |

पता था रेत से बनी दीवारे कमजोर होती हैं ,
फिर भी मजबूती देने की फजूल कोशिश की |
जब रेत इमारत की शकल लेने लगी , तो सोचा थोड़ा दूर से देखूं |

अभी थोडी दुरी …….और फिर एक लहर …
वही हुआ.. …जहाँ मैंने रेत का पहाड़ बनाया था …
वहां अब सपाट मैदान था एक वीरान मैदान |

और जाने क्यूँ उस मैदान में उस अधबने आकार को ढूंढ रहा था |
शायद मैं अकल’बंद’ था , तभी सब जानते हुए ,
इतनी महनत करने की सोचा , पर उस सोच पर गुस्सा आरहा था |

तभी एक हँसी सुनी ,ये मेरी ही हँसी थी ,
जाने कितने सपने टूटे थे इस रेत की ढेर की तरह |
कुछ अपने सपने कुछ अपनों के सपने ,समय की लहर में बह गए |

फिर वही हँसी , एक तेज़ हँसी और कुछ शोर |
सुबह का शोर, उस शोर में एक परिचित आवाज़ थी |
एक सुनी आवाज़ , ‘ उठो’ ‘चाय’ ‘न्यूज़ पेपर’ ‘सुबह आजतक’

आलस भिचे आँखे घड़ी पर नज़र डाली, ६ बजे थे सुबह के ,
सुबह का सपना , सचा सपना , अपना सपना, सपनो का सपना
अधूरा सपना , टुटा सपना , बिखरा सपना , और एक हँसी |

और एक नए दिन की शुरुआत, हँसी के साथ |
एक नई सुबह, एक नया सपना, एक नई लहर, एक नया सफर |
सब कुछ नया था बस एक चीज़ पुरानी थी -हँसी, मेरी अपनी हँसी |

– Dev B

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January 26, 2009

कुछ सच लिखूं या झूठ तमाम लिखूं

by Dev B

कुछ सच लिखूं या झूठ तमाम लिखूं

महानगरों  की  झूठी शान  लिखूंया 
या उ पास के  स्लम का  हाल लिखू .
काली सड़कों पर दौड़ती जिंदगी लिखूं,
या उस्सी सड़क पर टूटी साँस लिखूं
शहरों का बौधिक उठान लिखूं
या उनके नैतिक अवसान लिखूं

कुछ सच लिखूं या झूठ तमाम लिखूं

गाँव की खुशहाली लिखू
या रोते किशानो की दास्ताँ लिखू
उनकी जिंदगी पर जीत लिखूं
या मौत को गले लगाती हार लिखूं
हरी भरी खेत की पौध लिखूं
या कुपौषित बच्चो की पौध  लिखूं

कुछ सच लिखूं या झूठ तमाम लिखूं

– Dev  B

ek Adhuri kavita

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January 26, 2009

Can’t forget my childhood

by Dev B

Can’t forget my childhood,
…….which is still in my mood.
Paper plane in windy weather
…….Paper boats in rain’s water.
Laughing and crying in any season,
…… without knowing any reason.
That sweet nap on mother’s lap,
……..Oh god!
……..Why did you create such a big gap?
Where are my grannies and
…….. their fairly tales?
Where are my friends and
……..their lovely games?
My life is going different ways,
…….. Oh God!.
…….. Fulfill my only desire
……..help me to search my golden days.

– Dev B
15 June 2005

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