Posts tagged ‘life’

August 27, 2011

He left me speechless

by Dev B

He is fighting to make uncertain certain.
He gets simmer but sparkles delighter.
He confined under green curtain.
His eyes says pain to live lifeless.
I met him & he left me speechless.

He is reading reports; to say it’s in vain.
He is the lightweight fighter.
He has to win a great war to sustain.
His spirit is still fearless.
I met him & he left me speechless.

He is going through unbearable pain.
He still punctuates laughter,
Not once, not twice but again & again.
His smile is real and stainless.
I met him & he left me speechless.

-Dev B

I met my good friend who is a cancer patient. He taught me “how to live lifeless“.
God bless you and get well soon.

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August 21, 2011

You lost your words or I lost my hearing

by Dev B

Moments when we met in that summer.
Those sweet moments I still remember.

You asked my story, I asked your story
We talked about roller-coaster journey
It was almost enough to write history
Don’t know when we started our story.

We have numbers of similarities.
It questioned our singularities.

We traveled in emotion’s wain.
Our life had similar stain
We share the bond of pain.
Words were coming as rain.

It seemed God has heard our urge
And our lives started sudden surge

I don’t know what but something’s missing
May be Words, which were dazzling & raining
It formed a big gap, now heart is paining
You lost your words or I lost my hearing.

Better let the things happen naturally.
Believe me silence will break us badly

Where’re those tangible expressions.
Plz come back with communications.
Where’re those invincible passions.
Don’t tell, we don’t have emotions.

Moments when we met in that summer.
Those sweet moments I still remember.

– Dev B
As it happened. Inspired from someone’s life story.

August 20, 2011

गुल और गुलफाम

by Dev B

ग़म की गुलशन में
गुल की गुज़ारिश पे
गरीब गुलफाम ने,
गुमसुम गुमशुदा गिरां
ग़ज़ल गुलिश्तां की थी|

गैहान में गुप्तगू है कि
गुमराह गुल आज गैर
गर्दन में गुमगश्त है और
गुलिश्तां वो गर्द है आज
गुलफाम के दो गज पे|

     गिरां= अमूल्य | गुमगश्ता= भटकता |गैहान= संसार

-Dev B
(My first urdu writing, Dedicated to and Inspired by Sahir Saab’s life)

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August 18, 2011

पल पल हरक्षण हरपल

by Dev B

पल पल में बीता कल
बीत रहा आज हरपल
तो पल पल बीतेगा कल
पल पल हरक्षण हरपल

तू समर्पण कर हरपल
तू अर्पण कर पल पल
तो न समझे कोई हरपल
पल पल हरक्षण हरपल

इन्तजार न कर हरपल
ऐतबार न कर पल पल
तो बेजार न कर ये पल
पल पल हरक्षण हरपल

छुटे साथ कोई हरपल
टूटे बिस्वास पल पल
तो जीले रिश्तों के पल
पल पल हरक्षण हरपल

सोच न गम की हरपल
खुशियाँ बीती पल पल
तो गम बीतेगा पल पल
पल पल हरक्षण हरपल

जैसे बहता हो हरपल
नल से जल कल-कल
वैसे खोता जीवन पल
पल पल हर क्षण हरपल

सबका वक़्त बीते हरपल
मौत आती पास पल पल
तो जीले तू अपने हरपल
पल पल हरक्षण हरपल

जीवन के क्षणिक “पल” को समर्पित “एक अधूरी रचना”
-Dev B

August 6, 2011

जिंदगी कब किस ओर मुड़ जाए

by Dev B

किसी को खबर नहीं
है कि जिंदगी कब
किस ओर मुड़ जाए|
इस ओर जाएगी कि
उस ओर मुड़ जाएगी|
सीधी गयी भी तो क्या?
पकड़े राह कोई तो क्या?
मंजिल एक ही पायेगी|
वो मंजिल जो मेरी है
वही मंजिल तेरी भी है,
मंजिल है वही सबकी |
फिकर-ऐ-मंजिल
फिर करो क्यूँ तुम?
आश-ऐ-मंजिल
फिर रखो क्यूँ तूम?
राही बनो तुम
जिसकी राह नहीं|
बटोही बनो तुम
जिसकी बाट नहीं|
तुम अपनी राह
खुद आप बनाओ |
राह वो ऐसी हो कि
जिंदगी हमराह बने|
संग तेरे जिंदगी चले
तेरे संग जिंदगी मुड़े|
किसी को खबर नहीं
है कि जिंदगी कब
किस ओर मुड़ जाए|
– Dev B
July 9, 2011

इसी बारे में हमेशा, सोचता रहता हूँ मैं |

by Dev B

मैं कहाँ से आया हूँ,

और मुझे क्या करना हूँ?

इसी बारे में हमेशा,

सोचता रहता हूँ मैं |

फिर भी ये प्रश्न अनुतरित है,

मुझे कुछ पता नहीं है पर,

मुझे इस बात का यकीन है,

मेरी आत्मा कहीं और से है,

और मेरा अंत कहीं और है,

और उसी जगह को ढूढ रहा हूँ,

जहाँ जाकर मैं पूर्ण होऊँगा,

पर अभी  मैं कौन हूँ ?

इसी बारे में हमेशा,

सोचता रहता हूँ मैं |

मैं दूसरे द्वीप के एक,

साधारण पक्षी की तरह हूँ,

जो किसी दुसरे द्वीप के एक,

छोटे-से-अँधेरे पिंजरे में बंद है,

वो दिन जल्द आयेगा जब,

मैं उड़ जाऊँगा अपने द्वीप,

लेकिन अभी

कौन मेरे कानो से,

मेरी ही कोई सुन रहा है?

कौन मुझसे,

अपने शब्द बोल रहा है?

कौन मेरी आँखों से

दुनिया देख रहा है?

क्या यही आत्मा है?

इसी बारे में हमेशा,

सोचता रहता हूँ मैं |

मैं पिंजरे को,

तोड़ सकता  हूँ.

पर ये आत्मा  कहती है कि

न तो मैं यहाँ खुद से आया था,

न मैं इस तरह छोड़ना चाहता .

मुझे यहाँ लाया गया था

जो मुझे कल यहाँ लेके आये

वही कल मुझे वहां लेके जायेगे.

पर क्या वो कभी ऐसा चाहेंगे

और चाहे बी तो

क्या वो कभी ऐसा करेंगे

इसी बारे में हमेशा,

मैं सोचता रहता हूँ |

– Dev B