जिंदगी कब किस ओर मुड़ जाए

by Dev B
किसी को खबर नहीं
है कि जिंदगी कब
किस ओर मुड़ जाए|
इस ओर जाएगी कि
उस ओर मुड़ जाएगी|
सीधी गयी भी तो क्या?
पकड़े राह कोई तो क्या?
मंजिल एक ही पायेगी|
वो मंजिल जो मेरी है
वही मंजिल तेरी भी है,
मंजिल है वही सबकी |
फिकर-ऐ-मंजिल
फिर करो क्यूँ तुम?
आश-ऐ-मंजिल
फिर रखो क्यूँ तूम?
राही बनो तुम
जिसकी राह नहीं|
बटोही बनो तुम
जिसकी बाट नहीं|
तुम अपनी राह
खुद आप बनाओ |
राह वो ऐसी हो कि
जिंदगी हमराह बने|
संग तेरे जिंदगी चले
तेरे संग जिंदगी मुड़े|
किसी को खबर नहीं
है कि जिंदगी कब
किस ओर मुड़ जाए|
– Dev B
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One Comment to “जिंदगी कब किस ओर मुड़ जाए”

  1. Loved it. Love almost all poem at this blog. Keep writing 🙂

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