कुछ कही बहुत अनकही

by Dev B

जो बात  थी कुछ कही बहुत अनकही

पर सारी अनकही भी थी वहीँ कहीं

कभी जो एहसास कही गयी न कभी

वो एहसास है हर तरफ यहीं वहीँ

 

सब तो जानते थे वो नकही अनकही

फिर भी जब कही गयी कुछ अनकही

शब्दों का आभाव था पर भावना वही

सारे मनोभाव अब पर ख़ामोशी यहीं

 

पूरनमासी पर भी लगा डर वही

फिर जल्द आ जाये अमाबस नहीं

आसमान देखा तो चाँद दिखा वहीँ

चाहे जो हो कल जीले ये पल यहीं

 

जीने की प्यास न थी कल तक कहीं

आने वाले कल की तलाश अब नयी

आज की आस बहुत खास बनी वहीँ

साज हर अब कहे यही जीले बस यहीं कहीं

– Dev B

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One Comment to “कुछ कही बहुत अनकही”

  1. bahut sundar !! superb !!

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