Archive for July, 2011

July 30, 2011

तू ही इक मेरे संग

by Dev B

सब के संग हर रंग
मेरे बस तू ही संग
तेरा रंग मेरे अंग अंग
राग मेरा अब तेरे ढंग
रग-रग में मेरे तेरा भंग
तेरे भंग संग मन मलंग


गम मेरे तूही इक मेरे संग

ख़ुशी जब आये बन तरंग
न लाती अब कोई उमंग
आती ख़ुशी करने बस तंग
ख़ुशी करे हुडदंग करे है दंग
ऐ  गम संग तेरे मन पतंग
तेरे बिन कुछ न लगे विहंग

गम मेरे तूही इक मेरे संग
– Dev B
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July 24, 2011

कुछ कही बहुत अनकही

by Dev B

जो बात  थी कुछ कही बहुत अनकही

पर सारी अनकही भी थी वहीँ कहीं

कभी जो एहसास कही गयी न कभी

वो एहसास है हर तरफ यहीं वहीँ

 

सब तो जानते थे वो नकही अनकही

फिर भी जब कही गयी कुछ अनकही

शब्दों का आभाव था पर भावना वही

सारे मनोभाव अब पर ख़ामोशी यहीं

 

पूरनमासी पर भी लगा डर वही

फिर जल्द आ जाये अमाबस नहीं

आसमान देखा तो चाँद दिखा वहीँ

चाहे जो हो कल जीले ये पल यहीं

 

जीने की प्यास न थी कल तक कहीं

आने वाले कल की तलाश अब नयी

आज की आस बहुत खास बनी वहीँ

साज हर अब कहे यही जीले बस यहीं कहीं

– Dev B

July 9, 2011

इसी बारे में हमेशा, सोचता रहता हूँ मैं |

by Dev B

मैं कहाँ से आया हूँ,

और मुझे क्या करना हूँ?

इसी बारे में हमेशा,

सोचता रहता हूँ मैं |

फिर भी ये प्रश्न अनुतरित है,

मुझे कुछ पता नहीं है पर,

मुझे इस बात का यकीन है,

मेरी आत्मा कहीं और से है,

और मेरा अंत कहीं और है,

और उसी जगह को ढूढ रहा हूँ,

जहाँ जाकर मैं पूर्ण होऊँगा,

पर अभी  मैं कौन हूँ ?

इसी बारे में हमेशा,

सोचता रहता हूँ मैं |

मैं दूसरे द्वीप के एक,

साधारण पक्षी की तरह हूँ,

जो किसी दुसरे द्वीप के एक,

छोटे-से-अँधेरे पिंजरे में बंद है,

वो दिन जल्द आयेगा जब,

मैं उड़ जाऊँगा अपने द्वीप,

लेकिन अभी

कौन मेरे कानो से,

मेरी ही कोई सुन रहा है?

कौन मुझसे,

अपने शब्द बोल रहा है?

कौन मेरी आँखों से

दुनिया देख रहा है?

क्या यही आत्मा है?

इसी बारे में हमेशा,

सोचता रहता हूँ मैं |

मैं पिंजरे को,

तोड़ सकता  हूँ.

पर ये आत्मा  कहती है कि

न तो मैं यहाँ खुद से आया था,

न मैं इस तरह छोड़ना चाहता .

मुझे यहाँ लाया गया था

जो मुझे कल यहाँ लेके आये

वही कल मुझे वहां लेके जायेगे.

पर क्या वो कभी ऐसा चाहेंगे

और चाहे बी तो

क्या वो कभी ऐसा करेंगे

इसी बारे में हमेशा,

मैं सोचता रहता हूँ |

– Dev B