Archive for January 26th, 2009

January 26, 2009

कुछ सच लिखूं या झूठ तमाम लिखूं

by Dev B

कुछ सच लिखूं या झूठ तमाम लिखूं

महानगरों  की  झूठी शान  लिखूंया 
या उ पास के  स्लम का  हाल लिखू .
काली सड़कों पर दौड़ती जिंदगी लिखूं,
या उस्सी सड़क पर टूटी साँस लिखूं
शहरों का बौधिक उठान लिखूं
या उनके नैतिक अवसान लिखूं

कुछ सच लिखूं या झूठ तमाम लिखूं

गाँव की खुशहाली लिखू
या रोते किशानो की दास्ताँ लिखू
उनकी जिंदगी पर जीत लिखूं
या मौत को गले लगाती हार लिखूं
हरी भरी खेत की पौध लिखूं
या कुपौषित बच्चो की पौध  लिखूं

कुछ सच लिखूं या झूठ तमाम लिखूं

– Dev  B

ek Adhuri kavita

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January 26, 2009

सपनों का मर जाना ही, एक नई जिंदगी की सुरुआत है |

by Dev B

सपनो के साथ जीते जीते, न जाने कब सपनो से रिश्ता छुट गया |
और मरे हुए सपनो के साथ ,न जाने कब एक रिश्ता बन गया |

या यूँ कहो की ,
सपनों का मर जाना ही एक नई ज़िंदगी की शुरुआत थी |
क्यूंकि तब सिर्फ़ सपने जीते थे,
और सिर्फ़ सपने ही अपनों में थें |
क्यूंकि जब सपने मरे थे,
और तब ही मैंने घर को अपना जाना था |
क्यूंकि तब जाकर जाना,
सपनो के सुनहरे चादर के नीचे भी सचाई थी |
क्यूंकि चादर ढांप लेती थी,
पापा की थकान को और मां की मजबूरी|
क्यूंकि चादर ढांप लेती थी,
बहन की ऊब को और भाई के सपने|
क्यूंकि चादर ढांप लेती थी,
मुझसे जुड़े दुसरो के सपनो को |

सपनो के साथ जीते जीते, न जाने कब सपनो से रिश्ता छुट गया |
और मरे हुए सपनो के साथ , न जाने कब एक रिश्ता बन गया |

आज फिर न जाने क्यूँ,
पुराने सपनो के रिस्तो को जोड़ना चाहता हूँ |
क्यूंकि सपनो ने,
फिर पर्दों से झांकना सुरु कर दिया है |
क्यूंकि मुर्दे सपनो की अंगराई,
फिर मेरी नींद में खलल डाला है |
क्यूंकि जब सपने मर जाते हैं,
तो सारा व्यक्तित्व नंगा हो जाता है|
क्यूंकि इस नंगई में ही हम,
अपने जीवन का कोना तलाश लेते हैं|
क्यूंकि सपनो के लाश पर
हम बैठ जाते हैं, सिमटकर, थककर,
क्योंकि अब हमें वहीं उस लाश साथ,
खुद को तलाशने की झूठी कोशिश करनी है|

सपनो के साथ जीते जीते, न जाने कब सपनो से रिश्ता छुट गया |
और मरे हुए सपनो के साथ , न जाने कब एक रिश्ता बन गया |

पर कैसे भूल जाऊं |
सपनों का मर जाना ही,
एक DEGREE की सुरुआत है |
सपनों का मर जाना ही,
एक JOB की सुरुआत है |
सपनों का मर जाना ही,
समझदारी की पहचान है |
सपनों का मर जाना ही,
सामाजिक हर्ष है।
सपनों का मर जाना ही,
एक नई जिंदगी की सुरुआत है |

सपनो के साथ जीते जीते, न जाने कब सपनो से रिश्ता छुट गया |
और मरे हुए सपनो के साथ , न जाने कब एक रिश्ता बन गया |

अब ये मुर्दे सपने, अपने सपने
खिड़कियों से नही झांकते,
फिर भी परदे लगा रखे हैं |
सपनो की कब्र पर आखिरी कील ठोकी
उस कील पर टंगे नेमप्लेट लगाया
न जाने उसपर क्या क्या लिख दिया |
सपनों को मार दफ़न कर देना
आज सब कुछ था, है और रहेगा|
अब तो बस सपनों का मर जाना ही,
एक नई जिंदगी की सुरुआत है |

सपनो के साथ जीते जीते, न जाने कब सपनो से रिश्ता छुट गया |
और मरे हुए सपनो के साथ , न जाने कब एक रिश्ता बन गया |

-Dev B

– Oct-Nov 2005

-8ft*7ft , Ashram

A reply to my favorite poem “सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना

January 26, 2009

Can’t forget my childhood

by Dev B

Can’t forget my childhood,
…….which is still in my mood.
Paper plane in windy weather
…….Paper boats in rain’s water.
Laughing and crying in any season,
…… without knowing any reason.
That sweet nap on mother’s lap,
……..Oh god!
……..Why did you create such a big gap?
Where are my grannies and
…….. their fairly tales?
Where are my friends and
……..their lovely games?
My life is going different ways,
…….. Oh God!.
…….. Fulfill my only desire
……..help me to search my golden days.

– Dev B
15 June 2005

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